मुंबई: महाराष्ट्र की राजनीति में एक बार फिर बड़ा सियासी भूचाल आने की चर्चा तेज हो गई है। खबरें हैं कि उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली शिवसेना (UBT) के कई सांसद पार्टी नेतृत्व से नाराज चल रहे हैं और उनमें से कुछ सांसद एकनाथ शिंदे गुट के साथ जाने पर विचार कर रहे हैं। सूत्रों के हवाले से सामने आई जानकारी ने राज्य की राजनीति में नई बहस छेड़ दी है। सवाल यह उठ रहा है कि आखिर ऐसी कौन-सी वजहें हैं जिनके कारण उद्धव ठाकरे के करीबी माने जाने वाले सांसद अब उनसे दूरी बनाने लगे हैं।
राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि शिवसेना UBT के कुल 9 सांसदों में से 7 सांसदों के भीतर नेतृत्व को लेकर असंतोष है। हालांकि अभी तक किसी सांसद ने सार्वजनिक रूप से पार्टी छोड़ने की घोषणा नहीं की है, लेकिन पार्टी के अंदर चल रही नाराजगी की कई वजहें सामने आई हैं। इन वजहों को देखकर ऐसा लगता है कि मामला केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि व्यक्तिगत संबंधों और नेतृत्व शैली से भी जुड़ा हुआ है।
दुख की घड़ी में साथ न मिलने का आरोप
सूत्रों के अनुसार, एक सांसद ने अपनी नाराजगी की बड़ी वजह बताते हुए कहा कि जब उद्धव ठाकरे उनके संसदीय क्षेत्र के दौरे पर आए थे, तब पूरे कार्यक्रम की व्यवस्था और खर्च उन्होंने खुद उठाया था। इसी दौरान सांसद की पत्नी का निधन हो गया। सांसद का आरोप है कि इस कठिन समय में उद्धव ठाकरे ने न तो उन्हें फोन किया और न ही व्यक्तिगत रूप से संवेदना व्यक्त करने उनके घर पहुंचे।
सांसद का कहना है कि उन्हें इस बात का बेहद दुख हुआ कि पार्टी प्रमुख होने के बावजूद उद्धव ठाकरे ने उनकी निजी पीड़ा को समझने की कोशिश नहीं की। इसके विपरीत केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और अन्य नेताओं ने उनसे संपर्क कर सांत्वना दी। इससे उन्हें महसूस हुआ कि विपक्षी दलों के नेता उनके दुख में अधिक संवेदनशील दिखाई दिए।
दुर्घटना के समय भी नहीं मिला अपेक्षित सहयोग
एक अन्य सांसद की नाराजगी की वजह भी व्यक्तिगत अनुभव से जुड़ी बताई जा रही है। जानकारी के अनुसार, सांसद एक गंभीर सड़क दुर्घटना का शिकार हुए थे, जिसमें उनके पैर में गंभीर चोट आई थी। उस दौरान महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस और शिवसेना नेता एकनाथ शिंदे ने उनसे संपर्क किया और इलाज संबंधी मदद की पेशकश की।
बताया जा रहा है कि सांसद को उम्मीद थी कि उनकी अपनी पार्टी का शीर्ष नेतृत्व भी इसी तरह उनका हालचाल पूछेगा, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। यही कारण है कि उनके मन में नेतृत्व को लेकर असंतोष बढ़ता गया और वे खुद को पार्टी में उपेक्षित महसूस करने लगे।
चुनावी खर्च और संगठनात्मक मदद को लेकर भी असंतोष
कुछ सांसदों की नाराजगी केवल व्यक्तिगत नहीं बल्कि राजनीतिक और संगठनात्मक भी बताई जा रही है। सूत्रों के मुताबिक, स्थानीय निकाय चुनावों के दौरान कई नेताओं को पार्टी की ओर से अपेक्षित आर्थिक और संगठनात्मक सहायता नहीं मिली। एक सांसद ने दावा किया कि चुनाव अभियान का अधिकांश खर्च उन्हें अपनी जेब से उठाना पड़ा।
उनका कहना है कि जब उन्होंने पार्टी नेतृत्व से आर्थिक मदद की मांग की तो कोई ठोस सहायता नहीं मिली। दूसरी ओर, प्रतिद्वंद्वी दल अपने उम्मीदवारों और कार्यकर्ताओं पर खुलकर संसाधन खर्च कर रहे थे। इसका असर स्थानीय संगठन पर पड़ा और कई कार्यकर्ता तथा पदाधिकारी पार्टी छोड़कर अन्य दलों में चले गए।
सांसदों का मानना है कि यदि समय रहते संगठनात्मक सहायता और नेतृत्व का सहयोग मिला होता, तो स्थिति अलग हो सकती थी। इसी कारण पार्टी के भीतर असंतोष की भावना बढ़ती गई।
नेतृत्व शैली पर उठ रहे सवाल
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि शिवसेना UBT के कुछ नेताओं की शिकायतें केवल व्यक्तिगत घटनाओं तक सीमित नहीं हैं। इन घटनाओं के जरिए वे नेतृत्व की कार्यशैली पर सवाल उठा रहे हैं। कई नेताओं को लगता है कि पार्टी प्रमुख और सांसदों के बीच संवाद की कमी है। सांसदों का मानना है कि नेतृत्व को कार्यकर्ताओं और जनप्रतिनिधियों के साथ नियमित संपर्क बनाए रखना चाहिए, खासकर तब जब वे व्यक्तिगत या राजनीतिक संकट का सामना कर रहे हों।
दूसरी ओर, एकनाथ शिंदे और देवेंद्र फडणवीस जैसे नेताओं द्वारा व्यक्तिगत स्तर पर संपर्क बनाए रखने की चर्चा भी इन दिनों राजनीतिक हलकों में हो रही है। इससे कुछ सांसदों को यह महसूस हो रहा है कि उन्हें वहां अधिक महत्व और सहयोग मिल सकता है।
आगे क्या होगा?
फिलहाल शिवसेना UBT की ओर से इस पूरे मामले पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। पार्टी नेतृत्व लगातार यह संदेश देने की कोशिश कर रहा है कि संगठन एकजुट है और किसी तरह की टूट की आशंका नहीं है। हालांकि सूत्रों से सामने आ रही जानकारी ने राजनीतिक माहौल को गर्म कर दिया है।
यदि नाराज सांसदों को मनाने में पार्टी नेतृत्व सफल नहीं होता, तो आने वाले दिनों में महाराष्ट्र की राजनीति में एक और बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है। फिलहाल सभी की नजरें उद्धव ठाकरे और उनके नाराज सांसदों के अगले कदम पर टिकी हुई हैं। यह देखना दिलचस्प होगा कि पार्टी इन असंतुष्ट नेताओं को साथ रखने में सफल होती है या फिर महाराष्ट्र की राजनीति में एक नया समीकरण बनता है।