अमेरिका और ईरान के बीच 107 दिनों तक चले तनाव, सैन्य कार्रवाई और कूटनीतिक संघर्ष के बाद आखिरकार शांति समझौते का रास्ता साफ हो गया है। जिनेवा में 19 जून को इस समझौते पर आधिकारिक मुहर लगने की तैयारी है। दोनों देश इस समझौते को अपनी-अपनी जीत बता रहे हैं, लेकिन अंतरराष्ट्रीय मामलों के कई विशेषज्ञों का मानना है कि इस पूरे घटनाक्रम ने अमेरिका और उसके राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के दावों पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
ट्रंप प्रशासन ने युद्ध के दौरान जिन बड़े उद्देश्यों को सामने रखा था, उनमें से कई लक्ष्य या तो अधूरे रह गए हैं या फिर समझौते के बाद उनकी प्रासंगिकता ही समाप्त होती दिखाई दे रही है। यही कारण है कि भू-राजनीतिक विश्लेषक इस समझौते को अमेरिका की रणनीतिक जीत के बजाय एक जटिल और महंगी राजनीतिक चुनौती के रूप में देख रहे हैं।
युद्ध में उतरे थे बड़े लक्ष्य लेकर
राष्ट्रपति चुनाव के दौरान डोनाल्ड ट्रंप ने अमेरिकी जनता से वादा किया था कि वे विदेशों में नए युद्धों और सैन्य हस्तक्षेप से बचेंगे तथा देश की आर्थिक चुनौतियों पर ध्यान देंगे। लेकिन ईरान के साथ हुए संघर्ष ने उस वादे को उलट दिया। अमेरिका ने इजरायल के साथ मिलकर ईरान के खिलाफ व्यापक सैन्य अभियान चलाया, जिसमें अरबों डॉलर खर्च हुए और पूरे मध्य पूर्व में अस्थिरता बढ़ी।
युद्ध के दौरान ट्रंप प्रशासन ने दावा किया था कि वह ईरान को पूरी तरह झुकाने, उसके परमाणु कार्यक्रम को समाप्त करने और क्षेत्रीय प्रभाव को कमजोर करने में सफल रहेगा। हालांकि समझौते के बाद सामने आई तस्वीर इन दावों से काफी अलग नजर आ रही है।
बिना शर्त आत्मसमर्पण की मांग नहीं हुई पूरी
युद्ध के शुरुआती दिनों में ट्रंप ने कई बार सार्वजनिक रूप से कहा था कि ईरान को बिना किसी शर्त के आत्मसमर्पण करना होगा। अमेरिकी नेतृत्व का मानना था कि लगातार सैन्य दबाव के कारण तेहरान झुक जाएगा। लेकिन अंतिम समझौते में कहीं भी ईरान के आत्मसमर्पण जैसी कोई स्थिति दिखाई नहीं देती।
विशेषज्ञों का कहना है कि यदि युद्ध का घोषित लक्ष्य ईरान को पूरी तरह झुकाना था, तो यह उद्देश्य हासिल नहीं हो सका। इसके उलट, ईरान वार्ता की मेज पर एक संप्रभु राष्ट्र की तरह बैठा और समझौते का हिस्सा बना।
सत्ता परिवर्तन का सपना भी अधूरा
संघर्ष के दौरान अमेरिकी नेतृत्व ने कई बार ईरान की जनता से मौजूदा इस्लामिक शासन के खिलाफ खड़े होने की अपील की थी। माना जा रहा था कि युद्ध के दबाव से ईरान में सत्ता परिवर्तन का रास्ता खुलेगा।
लेकिन युद्ध समाप्त होने के बाद भी ईरान की राजनीतिक व्यवस्था कायम है। सत्ता का ढांचा पूरी तरह नहीं बदला और शासन व्यवस्था पहले की तरह कार्यरत है। इतना ही नहीं, कई विश्लेषकों का मानना है कि युद्ध के बाद उभरे नए नेतृत्व को पहले से अधिक कठोर और राष्ट्रवादी दृष्टिकोण वाला माना जा रहा है।
इससे यह संकेत मिलता है कि जिस राजनीतिक परिवर्तन की उम्मीद अमेरिका कर रहा था, वह वास्तविकता में नहीं हो पाया।
मिसाइल कार्यक्रम और क्षेत्रीय नेटवर्क बरकरार
ट्रंप प्रशासन की एक प्रमुख मांग यह भी थी कि ईरान अपना बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रम पूरी तरह समाप्त करे और क्षेत्र में सक्रिय अपने समर्थक समूहों को सहयोग देना बंद करे।
हालांकि समझौते से जुड़ी जानकारी में ऐसा कोई स्पष्ट संकेत नहीं मिला है कि ईरान ने इन दोनों मुद्दों पर अमेरिका की सभी शर्तें स्वीकार कर ली हों। मध्य पूर्व में ईरान का प्रभाव अब भी एक महत्वपूर्ण भू-राजनीतिक कारक बना हुआ है।
विश्लेषकों के अनुसार, यदि भविष्य में क्षेत्रीय तनाव फिर बढ़ता है तो यह मुद्दा दोबारा सामने आ सकता है।
परमाणु कार्यक्रम पर अब भी बने हुए हैं सवाल
युद्ध से पहले अमेरिका और ईरान के बीच परमाणु कार्यक्रम को लेकर बातचीत जारी थी। ट्रंप लगातार आरोप लगाते रहे कि ईरान परमाणु हथियार विकसित करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है।
युद्ध के दौरान अमेरिकी नेतृत्व ने कई बार यह दावा किया कि ईरान के परमाणु ढांचे को गंभीर नुकसान पहुंचाया गया है और संवर्धित यूरेनियम पर नियंत्रण हासिल किया जाएगा।
लेकिन समझौते के बाद सबसे बड़ा सवाल यही है कि ईरान के पास मौजूद उच्च स्तर का संवर्धित यूरेनियम आखिर किस स्थिति में रहेगा। अब तक उपलब्ध जानकारी में इस मुद्दे पर पूरी स्पष्टता नहीं है। यही कारण है कि कई विशेषज्ञ मानते हैं कि परमाणु विवाद पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है बल्कि केवल टल गया है।
फ्रोजेन एसेट्स की वापसी से बदले समीकरण
युद्ध से पहले अमेरिका और उसके सहयोगी देशों ने ईरान की विदेशों में मौजूद कई संपत्तियों पर प्रतिबंध या नियंत्रण लगा रखा था।
अब समझौते के तहत ईरान को उसकी कुछ जब्त संपत्तियां वापस मिलने की संभावना जताई जा रही है। हालांकि यह स्पष्ट नहीं है कि कितनी राशि वापस की जाएगी और उसका स्वरूप क्या होगा, लेकिन यह संकेत महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
आलोचकों का कहना है कि यदि युद्ध का उद्देश्य ईरान की आर्थिक क्षमता को कमजोर करना था, तो संपत्तियों की वापसी उस रणनीति के विपरीत दिखाई देती है।
होर्मुज जलडमरूमध्य फिर खुला, लेकिन खतरा बरकरार
ट्रंप प्रशासन समझौते की सबसे बड़ी उपलब्धि के रूप में होर्मुज जलडमरूमध्य के दोबारा खुलने को प्रस्तुत कर रहा है। यह समुद्री मार्ग वैश्विक तेल व्यापार के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है।
हालांकि विशेषज्ञ याद दिलाते हैं कि युद्ध शुरू होने से पहले भी यह मार्ग खुला हुआ था। संघर्ष के बाद उत्पन्न परिस्थितियों में इसे बंद किया गया और अब समझौते के बाद फिर खोला जा रहा है।
विश्लेषकों का मानना है कि इस पूरे घटनाक्रम ने यह दिखा दिया कि ईरान भविष्य में भी इस रणनीतिक मार्ग को दबाव के साधन के रूप में इस्तेमाल करने की क्षमता रखता है। इसलिए समस्या का स्थायी समाधान अभी भी नहीं हुआ है।
मध्य पूर्व में सहयोगियों की चिंता बढ़ी
अमेरिका लंबे समय से मध्य पूर्व में अपने सहयोगी देशों को सुरक्षा की गारंटी देता रहा है। लेकिन ईरान के साथ हुए लंबे संघर्ष और उसके बाद हुए समझौते ने कई क्षेत्रीय देशों के मन में नए सवाल खड़े कर दिए हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि इन देशों ने देखा कि भारी सैन्य कार्रवाई के बावजूद ईरान पूरी तरह पराजित नहीं हुआ। इससे क्षेत्र में शक्ति संतुलन को लेकर नई बहस शुरू हो गई है।
कुछ विश्लेषकों का कहना है कि आने वाले वर्षों में मध्य पूर्व के कई देश अपनी सुरक्षा रणनीतियों पर नए सिरे से विचार कर सकते हैं।
विशेषज्ञों की राय: सैन्य नहीं, कूटनीतिक समाधान बेहतर था
विदेश नीति विशेषज्ञों का मानना है कि यह समझौता तत्काल टकराव को रोकने के लिहाज से महत्वपूर्ण है, लेकिन अगर शुरुआत से ही कूटनीतिक रास्ते पर अधिक जोर दिया जाता तो परिणाम और बेहतर हो सकते थे।
कई अंतरराष्ट्रीय विश्लेषकों का कहना है कि युद्ध ने दोनों पक्षों को भारी आर्थिक और राजनीतिक नुकसान पहुंचाया, जबकि अंततः समाधान वार्ता के जरिए ही निकला। यही कारण है कि समझौते को लेकर अमेरिका की जीत के दावों पर सवाल उठ रहे हैं।